H-1B वीजा सिलेक्शन रेट में बड़ा उछाल, कम आवेदन बने वजह; क्या ट्रंप की नीति रही असरदार?

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अमेरिका के H-1B वीजा प्रोग्राम में इस साल बड़ा बदलाव देखने को मिला है। सिलेक्शन रेट में अचानक उछाल दर्ज किया गया है, जिससे कई आवेदकों के लिए चयन की संभावनाएं पहले के मुकाबले काफी बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह बदलाव महज संयोग नहीं, बल्कि नई नीतियों और घटती आवेदन संख्या का संयुक्त असर है।

50% से 75% तक पहुंचा सिलेक्शन रेट

ताजा आंकड़ों के अनुसार, इस साल H-1B वीजा का चयन दर कई मामलों में 50 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गया है, जबकि कुछ श्रेणियों में यह 75 प्रतिशत तक भी दर्ज किया गया। पहले यह दर औसतन करीब 33 प्रतिशत रहती थी। खासकर उच्च वेतन और मास्टर्स डिग्री वाले उम्मीदवारों को इस बार अधिक लाभ मिला है।

आवेदनों में भारी गिरावट बना मुख्य कारण

रिपोर्ट्स के अनुसार, चयन दर में इस उछाल की सबसे बड़ी वजह आवेदन संख्या में आई तेज गिरावट है। इस साल H-1B वीजा के लिए करीब 1.95 लाख से 2.35 लाख के बीच आवेदन आए, जो पिछले वर्षों की तुलना में लगभग 43 प्रतिशत कम हैं। कुछ साल पहले यही संख्या 7.5 लाख से ज्यादा थी। कम आवेदकों के कारण स्वाभाविक रूप से चयन की संभावना बढ़ गई।

ट्रंप प्रशासन की नीतियों का असर

Donald Trump प्रशासन की नई आप्रवासन नीतियों को इस बदलाव की बड़ी वजह माना जा रहा है। विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने पर करीब 1 लाख डॉलर की भारी फीस लगाए जाने से कंपनियों के लिए इंटरनेशनल हायरिंग महंगी हो गई है। इसका असर यह हुआ कि कई अस्पताल, विश्वविद्यालय और टेक कंपनियों ने विदेश से भर्ती कम कर दी।

इसके साथ ही नई “वेटेड लॉटरी सिस्टम” लागू किया गया, जिसमें अधिक वेतन और अनुभवी उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जाती है। इससे सीनियर और हाई-स्किल्ड प्रोफेशनल्स को ज्यादा फायदा मिला, जबकि फ्रेशर्स के लिए प्रतिस्पर्धा अपेक्षाकृत कठिन हो गई।

टेक सेक्टर में बदलते ट्रेंड का भी असर

टेक इंडस्ट्री में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में बढ़ते निवेश और सीनियर रोल्स पर फोकस के चलते भी H-1B वीजा की मांग में कमी आई है। कई कंपनियों ने नीतिगत अनिश्चितता के कारण इस साल लॉटरी प्रक्रिया से दूरी बनाई।

क्या ट्रंप की नीति सफल रही?

विशेषज्ञ मानते हैं कि चयन दर में बढ़ोतरी को आंशिक रूप से नीति की सफलता माना जा सकता है, लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि कम आवेदन आने के कारण यह उछाल दिख रहा है। फिलहाल 1 लाख डॉलर शुल्क को लेकर अमेरिकी अदालतों में कई याचिकाएं लंबित हैं। आने वाले समय में अदालतों के फैसले और संभावित नीति बदलाव तय करेंगे कि यह मॉडल दीर्घकालिक रूप से कितना सफल साबित होता है।