टर्म इंश्योरेंस को लेकर फैली 7 बड़ी गलतफहमियां, जिनकी वजह से भारतीय आज भी उठा रहे हैं जोखिम

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आज के दौर में वित्तीय सुरक्षा का मतलब सिर्फ बचत करना नहीं, बल्कि जोखिम को समय रहते कम करना भी है। टर्म इंश्योरेंस जीवन बीमा का सबसे सरल और शुद्ध स्वरूप माना जाता है, जिसका उद्देश्य केवल सुरक्षा देना होता है। पॉलिसी अवधि के दौरान यदि पॉलिसीधारक की मृत्यु हो जाती है, तो नामांकित व्यक्ति को एक निश्चित और बड़ी राशि मिलती है, जिससे परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी हो सकें। इसके बावजूद भारत में टर्म इंश्योरेंस को लेकर कई ऐसे मिथक प्रचलित हैं, जिनकी वजह से लोग सही समय पर सही फैसला नहीं ले पाते।

मिथक 1: टर्म इंश्योरेंस पैसे की बर्बादी है

यह धारणा सबसे ज्यादा प्रचलित है कि अगर पॉलिसी अवधि पूरी हो गई और कुछ नहीं हुआ तो प्रीमियम बेकार चला गया। जबकि सच्चाई यह है कि टर्म इंश्योरेंस कोई निवेश नहीं, बल्कि जोखिम से सुरक्षा का साधन है। ठीक उसी तरह जैसे कार या हेल्थ इंश्योरेंस होता है, जहां आप सुरक्षा के लिए भुगतान करते हैं, न कि रिटर्न के लिए। इसका असली फायदा तब मिलता है, जब परिवार को कठिन समय में आर्थिक सहारा मिलता है।

मिथक 2: ऑफिस का ग्रुप इंश्योरेंस ही पर्याप्त है

कई नौकरीपेशा लोग मानते हैं कि कंपनी द्वारा दिया गया ग्रुप लाइफ इंश्योरेंस काफी है। हकीकत यह है कि यह कवर पूरी तरह नौकरी पर निर्भर करता है। नौकरी बदलते ही या छूटते ही यह सुरक्षा खत्म हो जाती है। इसके अलावा, यह कवर अक्सर होम लोन, बच्चों की पढ़ाई और रोजमर्रा के खर्चों के मुकाबले काफी कम होता है। इसलिए व्यक्तिगत टर्म प्लान होना बेहद जरूरी है।

मिथक 3: टर्म प्लान लेने के लिए अभी उम्र कम है

लोगों को लगता है कि बीमा बाद में लिया जाएगा, अभी जरूरत नहीं। जबकि टर्म इंश्योरेंस खरीदने का सबसे सही समय 20 से 30 साल की उम्र होती है। इस उम्र में प्रीमियम बेहद कम होता है और एक बार दर लॉक हो गई तो पूरी पॉलिसी अवधि तक वही रहती है। उम्र बढ़ने के साथ बीमारियों का खतरा और प्रीमियम दोनों बढ़ जाते हैं।

मिथक 4: उम्र के साथ प्रीमियम बढ़ता रहता है

यह भी एक आम गलतफहमी है। वास्तव में टर्म इंश्योरेंस का प्रीमियम पॉलिसी लेते समय तय हो जाता है और पूरी अवधि तक समान रहता है। चाहे 30 साल की पॉलिसी हो या 40 साल की, हर साल एक ही प्रीमियम देना होता है, जो इसे दीर्घकालिक योजना के लिए किफायती बनाता है।

मिथक 5: ऑफलाइन एजेंट से लेना ज्यादा सुरक्षित है

अक्सर माना जाता है कि एजेंट के जरिए बीमा लेना ज्यादा भरोसेमंद होता है। जबकि ऑनलाइन टर्म इंश्योरेंस न केवल सुरक्षित है, बल्कि सस्ता भी पड़ता है। ऑनलाइन खरीद में एजेंट का कमीशन नहीं जुड़ता, जिससे प्रीमियम कम हो जाता है और जानकारी सीधे बीमा कंपनी तक पहुंचती है।

मिथक 6: टर्म इंश्योरेंस लेना बहुत जटिल प्रक्रिया है

पहले बीमा लेना मुश्किल जरूर था, लेकिन अब प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है। कुछ ही मिनटों में मोबाइल या लैपटॉप से आवेदन किया जा सकता है। कई कंपनियां टेली-मेडिकल या घर पर मेडिकल जांच की सुविधा भी देती हैं, जिससे प्रक्रिया सरल और समय बचाने वाली हो गई है।

मिथक 7: सिर्फ कमाने वाले सदस्य को ही बीमा चाहिए

अधिकतर लोग मानते हैं कि केवल घर के कमाने वाले सदस्य को ही जीवन बीमा जरूरी है। जबकि घर संभालने वाले सदस्य का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। गृहिणी की अनुपस्थिति में घरेलू काम, बच्चों की देखभाल और अन्य जिम्मेदारियों के लिए अतिरिक्त खर्च बढ़ सकता है। इसलिए गृहणियों के लिए भी टर्म इंश्योरेंस लेना समझदारी भरा कदम है।

निष्कर्ष: गलतफहमियों से नहीं, सही जानकारी से लें फैसला

कम उम्र में टर्म इंश्योरेंस लेने से न सिर्फ प्रीमियम कम रहता है, बल्कि परिवार के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच भी तैयार हो जाता है। जरूरी है कि मिथकों के बजाय सच्चाई को समझा जाए और समय रहते सही वित्तीय निर्णय लिया जाए, ताकि अनिश्चित भविष्य में भी परिवार आर्थिक रूप से सुरक्षित रह सके।