ट्रंप-डेनमार्क विवाद में बड़ा मोड़, ग्रीनलैंड पर बनी डील; अमेरिका बढ़ाएगा सैन्य मौजूदगी, संप्रभुता पर बनी रहेगी डेनमार्क की पकड़
वॉशिंगटन: ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद अब एक नए चरण में पहुंच गया है। अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच आर्कटिक द्वीप की सुरक्षा को लेकर एक समझौते पर सहमति बनी है, जिसके तहत ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी को काफी बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने स्पष्ट किया है कि इस व्यवस्था से ग्रीनलैंड की संप्रभुता या वहां के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार पर असर नहीं पड़ेगा। समझौते पर 22 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
ग्रीनलैंड खरीदने की मांग से सैन्य समझौते तक पहुंचा मामला
ग्रीनलैंड को लेकर डोनाल्ड ट्रंप की दिलचस्पी 2019 से ही विवाद का विषय रही है। अपने पहले कार्यकाल में ट्रंप ने अमेरिका के लिए ग्रीनलैंड खरीदने में रुचि दिखाई थी, लेकिन डेनमार्क ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। इसके बाद ट्रंप ने डेनमार्क की प्रस्तावित यात्रा भी रद्द कर दी थी।
दिसंबर 2024 में ट्रंप ने फिर कहा कि ग्रीनलैंड का स्वामित्व और नियंत्रण अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। ग्रीनलैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री म्यूट बोरोप एगेडे ने साफ कहा था कि ग्रीनलैंड बिक्री के लिए नहीं है।
ट्रंप के रुख से 2025 में और बढ़ा तनाव
जनवरी 2025 में ट्रंप के बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर ने ग्रीनलैंड का दौरा किया। इसी दौरान ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण हासिल करने के लिए सैन्य बल के इस्तेमाल की संभावना से इनकार नहीं किया था।
मार्च 2025 में ग्रीनलैंड में चुनाव हुए, जिसके बाद वहां की संसद में मौजूद प्रमुख राजनीतिक दलों ने अमेरिकी नियंत्रण के विचार का विरोध किया। 28 मार्च को तत्कालीन अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ग्रीनलैंड स्थित पिटुफिक अंतरिक्ष अड्डे का दौरा किया था और डेनमार्क पर द्वीप की सुरक्षा में पर्याप्त निवेश नहीं करने का आरोप लगाया था।
2026 में नाटो तक पहुंचा विवाद
जनवरी 2026 में डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन ने संभावित अमेरिकी सैन्य कब्जे को नाटो के लिए गंभीर संकट बताया था। इसके बाद अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ा। ट्रंप ने ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का समर्थन नहीं करने वाले कुछ यूरोपीय देशों पर शुल्क लगाने की चेतावनी भी दी थी, हालांकि बाद में प्रस्तावित शुल्क वापस ले लिए गए।
इसके बाद अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच आर्कटिक सुरक्षा को लेकर तकनीकी बातचीत शुरू हुई। मौजूदा समझौते को इसी लंबी बातचीत का परिणाम माना जा रहा है।
क्या है नए समझौते में?
18 सितंबर को ट्रंप ने घोषणा की थी कि अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के बीच ऐसी व्यवस्था पर सहमति बनी है, जिससे ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य मौजूदगी बढ़ाई जाएगी। समझौते में अमेरिका के विरोधी देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य अड्डे स्थापित करने या कुछ संवेदनशील निवेश करने से रोकने की व्यवस्था भी बताई गई है।
हालांकि, समझौते का पूरा कानूनी पाठ अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। डेनमार्क ने कहा है कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता से समझौता नहीं होगा और उसकी सुरक्षा को व्यापक नाटो व्यवस्था के तहत देखा जाएगा।
ग्रीनलैंड में दो नए अमेरिकी सैन्य ठिकानों की तैयारी
ताजा रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका ग्रीनलैंड में दो सैन्य ठिकानों की दिशा में आगे बढ़ सकता है। इनमें दक्षिणी ग्रीनलैंड के नार्सार्सुआक में शीत युद्ध के दौर के पुराने अमेरिकी सैन्य अड्डे को फिर सक्रिय करने और पूर्वी ग्रीनलैंड के मेस्टरस्विग में नया सैन्य ठिकाना स्थापित करने की योजना शामिल है। फिलहाल ग्रीनलैंड में पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिका का प्रमुख सक्रिय सैन्य प्रतिष्ठान है।
रॉयटर्स के अनुसार, यह कदम शीत युद्ध के बाद ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य ढांचे के सबसे बड़े विस्तारों में से एक हो सकता है। नई व्यवस्था का उद्देश्य आर्कटिक सुरक्षा को मजबूत करना और इस क्षेत्र में सैन्य मौजूदगी से जुड़े अधिकारों को स्पष्ट करना बताया जा रहा है।
ट्रंप का दावा और डेनमार्क का अलग रुख
ट्रंप ने इस समझौते को ग्रीनलैंड की सुरक्षा पर अमेरिका के लिए स्थायी अधिकारों के रूप में पेश किया है। वहीं डेनमार्क ने उनकी इस व्याख्या को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड का कहना है कि समझौता उनकी संप्रभुता और ग्रीनलैंड के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार का सम्मान करता है।
इस तरह ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने या खरीदने की पुरानी चर्चा अब सीधे क्षेत्रीय सुरक्षा और सैन्य सहयोग की व्यवस्था में बदलती दिखाई दे रही है। समझौते का अंतिम कानूनी स्वरूप और उसके तहत अमेरिकी सैन्य अधिकारों की पूरी सीमा दस्तावेज सार्वजनिक होने के बाद अधिक स्पष्ट होगी।





